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मनासा.तुंगभद्रा नदी के किनारे रहने वाले आत्मदेव ब्राह्मण होकर विद्वान होकर भी अत्यन्त दुःखी थे। कोई संतान नहीं थी अतः वन में आत्महत्या करने के विचार से गए। एक महात्मा मिले तो कहने लगे। मेरा पुत्र नहीं है तो मुझे मुक्ति कैसे मिलेगी। उक्त बात उषागंज कालोनी में श्री मद भागवत कथा में पंजाबी धर्मशाला में संत कृष्णा नन्द जी ने व्यक्त किए संत महात्मा ने कहा 'मुक्ति पुत्र से नहीं अपने कर्मों से मिलती है। पुत्र से नाम रोशन हो जरूरी नहीं। उसमें नाम डूबने का अंदेशा अधिक है पर आत्मदेव नहीं माने। महात्मा द्वारा दिए फल से उनकी दो संतानें हुई। छोटा गोकर्ण विद्वान ज्ञानी और परोपकारी था। और महात्मा के कथनानुसार धुंधकारी चोर शराबी और अत्याचारी बन गया। उसने धन के लिए भयानक पाप किए। तंग आकर आत्महत्या की और बुरे कर्मों के कारण उसकी अस्वाभाविक और हिंसक मृत्यु हुई। जिससे वह पिशाच (प्रेत) योनि को प्राप्त हुआ।
ज्ञानी गोकर्ण ने अपने भाई को प्रेत योनि से छुड़ाने के लिए सात दिवसीय भागवत कथा का आयोजन किया। कथा सुनने के लिए धुंधकारी का प्रेत एक सात गांठों वाले बांस में बैठकर सात दिन लगातार बिना कुछ खाए पिए कथा श्रवण करता रहा। एक दिन में एक गांठ खुलती गई सात दिन में सातों गांठें खुल गईं ये गांठें और कुछ नहीं मनुष्य के भीतर के काम-क्रोध-लोभ-ईर्ष्या-मद-मोह आदि विकार हैं जो भागवत श्रवण से दूर होते हैं। धुंधकारी जैसा पापी भी प्रेत योनि से मुक्त हो गया। दिव्य विमान द्वारा बैकुंठ धाम चला गया। यह कथा की महिमा है जिसके प्रभाव से पापी और प्रेत भी मुक्त होकर देवता बन जाते हैं। कथा भक्ति को जगाती है, ईश्वर दर्शन कराती है और अंत में मुक्ति दिलाती है उपरोक्ताशय के सद्विचार राष्ट्रीय संत डॉ. श्री कृष्णानंद जी गुरुदेव ने व्यक्त किए संत श्री उपांगज अयोध्यापुरी धर्मशाला के विशाल परिसर में सात दिवसीय भागवत महापुराण के धुंधकारी-गोकर्ण-आत्मदेव की कथा संदर्भ की तात्विक विवेचना कर रहे थे। प्रथम दिवसीय कथा का आरंभ कलश यात्रा के समापन के पश्चात हुआ। प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से 5-30 तक कथा की ज्ञान गंगा कथा स्थल अयोध्यापुरी धर्मशाला में अनवरत है। इस दिन की कथा का विराम आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ।