📰 पूरी खबर:

 

 (डॉ नरेंद्र डबकरा  प्राध्यापक भौतिकी)
 

 "शिक्षक वह नहीं है जो केवल पाठ पढ़ाता है, शिक्षक तो विद्यार्थी के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचान कर उसे अपने जीवन का मार्ग स्वयं चुनने की शक्ति देता है।"

 भारत में प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। मेरे लिए शिक्षक दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि अपने लंबे शिक्षकीय जीवन की यात्रा को पीछे मुड़कर देखने और स्वयं से यह प्रश्न पूछने का अवसर है कि मैं अपने विद्यार्थियों, संस्था, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को कितना निभा पाया? चार दशकों से अधिक समय तक शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हुए, कभी कक्षा में विषय पढ़ाने वाले शिक्षक के रूप में, तो कभी विद्यार्थियों के मार्गदर्शक के रूप में, तो कभी सहकर्मियों के साथ संस्था निर्माण में सहयोगी के रूप में, तो कभी प्राचार्य के रूप में प्रशासनिक एवं शैक्षिक दायित्व निभाते हुए मैंने अनुभव किया कि शिक्षा का वास्तविक प्रभाव पाठ्यक्रम की समाप्ति के बाद शुरू होता है।

 *विद्यार्थी के प्रति शिक्षक का दायित्व*

 मैं भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी और शिक्षक रहा हूं। विज्ञान ने मुझे तर्क, प्रमाण और जिज्ञासा का महत्व सिखाया, जबकि शिक्षण ने मुझे मनुष्य को समझना सिखाया। धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि प्रत्येक विद्यार्थी अपने भीतर एक अलग संसार लेकर कक्षा में आता है। किसी विद्यार्थी में प्रतिभा तो होती है, लेकिन आत्मविश्वास का अभाव होता है, तो कोई विद्यार्थी प्रतिभाशाली होते हुए भी आर्थिक अथवा पारिवारिक परिस्थितियों से संघर्ष कर रहा होता है, तो कोई विद्यार्थी पढ़ाई में सामान्य दिखाई देता है, लेकिन उसमें कला, खेल, नेतृत्व, लेखन या सामाजिक कार्य की असाधारण क्षमता छिपी होती है। इसलिए शिक्षक का पहला दायित्व है कि वह विद्यार्थियों का मूल्यांकन केवल अंको से ना करें, बल्कि उसके व्यक्तित्व को पहचाने। मेरे अनुभव में एक शिक्षक द्वारा अपने विद्यार्थी पर किया गया विश्वास कई बार उस विद्यार्थी के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है। जब शिक्षक विद्यार्थी से कहता है "मुझे विश्वास है कि तुम यह कार्य कर सकते हो", तो यह साधारण वाक्य नहीं होता है। कई बार यही विश्वास विद्यार्थी को असफलता से बाहर निकाल कर सफलता की ओर ले जाता है। मेरे शिक्षकीय जीवन में ऐसे अनेक विद्यार्थी आए जिन्होंने प्रारंभ में सामान्य प्रदर्शन किया, लेकिन उचित मार्गदर्शन और प्रोत्साहन ने उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां दिलाईं। इसलिए शिक्षक को प्रत्येक विद्यार्थी में संभावना देखनी चाहिए। विडंबना  है कि आज शिक्षा को केवल रोजगार और प्रतियोगिता से जोड़कर देखा जाता है, जबकि शिक्षा का उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक है। मेरे विचार से शिक्षा की सफलता तब है, जब विद्यार्थी अच्छा करियर बनाने के साथ अच्छा चरित्र भी बनाएं।

*वर्तमान पीढ़ी (Gen Z)के प्रति शिक्षक के दायित्व*

 वर्तमान युवा पीढ़ी वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के वातावरण में बचपन से ही दुनिया को देखा है। इसलिए शिक्षक का दायित्व है कि वह इस पीढ़ी की विशेषताओं को समझे, उनकी क्षमताओं को पहचाने और उनकी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अपनी शिक्षण पद्धति में आवश्यक परिवर्तन करें। शिक्षक, विद्यार्थियों को डिजिटल दुनिया का विवेकपूर्ण उपयोग करना सिखाएं। विद्यार्थियों को  समझाना होगा कि इंटरनेट पर उपलब्ध प्रत्येक सूचना सही नहीं होती है। उनमें सूचना की सत्यता जांचने, स्रोत पहचाननें और गलत सूचना से बचने की क्षमता विकसित करनी होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में विद्यार्थियों को यह सीखाना  आवश्यक है कि AI से प्राप्त जानकारी को बिना सोचे-समझे स्वीकार न करें। मानवीय विवेक, मौलिक चिंतन और रचनात्मकता का महत्व हमेशा बना रहेगा। आज का शिक्षक यदि वर्तमान पीढ़ी की भाषा, उसकी तकनीकी दुनिया, उसकी आकांक्षाओं और उसकी चुनौतियों को समझ कर अपने अनुभवों एवं जीवन मूल्यों से उसे जोड़ सके तो वह एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर सकता है जो तकनीकी रूप से सक्षम, बौद्धिक रूप से स्वतंत्र, भावनात्मक रूप से संवेदनशील, नैतिक रूप से मजबूत और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार हो। यही आज के शिक्षक की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।

*समाज के प्रति शिक्षक का दायित्व*

 शिक्षक समाज का जागरूक नागरिक और मार्गदर्शक भी होता है। शिक्षा का प्रकाश तभी सार्थक है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचें। शिक्षक विद्यार्थियों के माध्यम से समाज में स्वच्छता, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक जागरूकता, नारी सम्मान, नशा मुक्ति, डिजिटल जागरूकता जैसे विषयों पर चेतना उत्पन्न कर सकता है। मेरा मानना है कि शिक्षक जितना कक्षा का होता है उतना ही समाज का भी होता है।

*राष्ट्र के प्रति शिक्षक का दायित्व* 

राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार शिक्षा है और शिक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षक है। शिक्षक की जिम्मेदारी है कि वह एक ऐसी पीढ़ी तैयार करें जो ज्ञानवान होने के साथ ईमानदार, संवेदनशील, अनुशासित और जिम्मेदार नागरिक हों। इसलिए जब एक शिक्षक अपने विद्यार्थी को जिम्मेदार नागरिक बनाता है तब वह वास्तव में राष्ट्र निर्माण कर रहा होता है।

*प्राचार्य के रूप में अनुभव*

 प्राचार्य के रूप में कार्य करते हुए मुझे यह समझने का अवसर मिला कि एक शिक्षण संस्था का वास्तविक विकास उसके शैक्षिक वातावरण, नवाचारों और विद्यार्थियों की उपलब्धियों से होता है। इसी सोच के साथ मैंने श्री सीताराम जाजू शासकीय कन्या महाविद्यालय में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए निःशुल्क मार्गदर्शन, व्यावसायिक प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास, सांस्कृतिक गतिविधियां, खेलकूद, पर्यावरण जागरूकता, सामाजिक सरोकार और रचनात्मक गतिविधियां प्रारंभ की। मेरा विश्वास रहा है कि महाविद्यालय केवल डिग्री देने का स्थान नहीं होना चाहिए। वह एक ऐसा केंद्र बने जहां से विद्यार्थी ज्ञान, कौशल, संस्कार और आत्मविश्वास लेकर बाहर निकले। शिक्षक का दायित्व है कि वह विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताएं की परीक्षा में क्या पढ़ना है, बल्कि यह भी बताएं कि लक्ष्य कैसे निर्धारित करना है, समय का प्रबंधन कैसे करना है और असफलता के बाद स्वयं को कैसे संभालना है।

 एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार कोई प्रमाण पत्र या सम्मान नहीं बल्कि उसके विद्यार्थियों की सफलता होती है। मेरे शिक्षकीय जीवन में अनेक विद्यार्थियों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई। जब कोई पूर्व विद्यार्थी वर्षों बाद मिलने पर यह कहता है -  "सर आपने उस समय मेरा मार्गदर्शन किया था, इसलिए मैं आज यहां हूं" तो शिक्षक को लगता है कि उसके जीवन का श्रम सार्थक हुआ। 
चार दशकों से अधिक के अनुभव ने मुझे यह सिखाया है कि जो शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर देता है वह विद्यार्थी को लंबे समय तक प्रेरित नहीं कर सकता है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शिक्षा और इंटरनेट ने ज्ञान की दुनिया को बहुत व्यापक बना दिया है । इसलिए शिक्षक को भी निरंतर अध्ययन, प्रशिक्षण और आत्म मूल्यांकन करते रहना चाहिए। सच्चा शिक्षक जीवन भर विद्यार्थी ही बना रहता है। मेरे विचार से शिक्षक दिवस सम्मान से अधिक आत्म मंथन का अवसर है। इस शिक्षकीय यात्रा में मैंने एक बात बहुत गहराई से अनुभव की है - शिक्षक का प्रभाव उसकी उपस्थिति से अधिक उसकी अनुपस्थिति में दिखाई देता है। जब विद्यार्थी शिक्षक के पास नहीं होता है और फिर भी शिक्षक की कही हुई कोई बात उसके निर्णय को प्रभावित करती है, जब कोई पूर्व विद्यार्थी जीवन के किसी मोड़ पर शिक्षक द्वारा दिए गए संस्कार को याद करता है, जब कोई विद्यार्थी समाज के लिए उपयोगी कार्य करता है - तभी शिक्षक की वास्तविक सफलता दिखाई देती है। मेरे चार दशकों से अधिक के शिक्षकीय अनुभव का सार यही है कि -  विद्यार्थी को ज्ञान दें, उन्हें कौशल दें, उन में संस्कार भरे, उनके भीतर आत्मविश्वास जगाएं, उन्हें समाज से जोड़ें और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का बोध कराएं। तभी शिक्षा पूर्ण होगी और तभी शिक्षक दिवस की सार्थकता सिद्ध होगी ।

*चिंतन कोष*

1.क्या शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक ही सीमित होना चाहिए?

2.विद्यार्थी के व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षक के आचरण की क्या भूमिका है?

3.शिक्षा को रोजगार के साथ संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है?

4.बदलती तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में  शिक्षक को स्वयं किस प्रकार निरंतर विकसित होना चाहिए ?

5.शिक्षक, समाज और राष्ट्र के निर्माण में किस प्रकार सक्रिय भूमिका निभा सकता है ‌?