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भोपाल । मरीज डॉक्टर के पास बीमारी का इलाज कराने जाता है, लेकिन आरोप है कि निजी अस्पतालों की व्यवस्था में उसकी जेब पहले ही तय हो जाती है। कौन-सी दवा लिखी जाएगी, कहां से खरीदी जाएगी और उसकी कीमत कितनी होगी-इन सवालों के पीछे दवा कंपनियों और निजी अस्पतालों के बीच कथित कारोबारी गठजोड़ की तस्वीर सामने आ रही है। आरोप है कि कंपनी का ब्रांड ज्यादा लिखने के बदले डॉक्टरों को महंगे गिफ्ट, कमीशन, होटल सेमिनार और विदेशी टूर तक के ऑफर दिए जाते हैं। यानी मरीज की बीमारी एक तरफ और कंपनी का बिक्री टारगेट दूसरी तरफ। जितनी ज्यादा पर्चियां, उतना बड़ा कथित फायदा। इस पूरे खेल में सबसे कमजोर कड़ी मरीज है, जो डॉक्टर की लिखी दवा को बिना सवाल किए खरीदने को मजबूर होता है।
सबसे बड़ा सवाल दवाओं की कीमत को लेकर है। आरोप है कि जिस साल्ट की दवा सामान्य बाजार में करीब 50 रुपए में उपलब्ध है, उसी साल्ट का ब्रांडेड संस्करण 250 से 300 रुपए तक बेचा जा रहा है। कीमत का यह अंतर आखिर किसकी जेब में जा रहा है, इसकी जांच की जरूरत है। जानकारी के अनुसार, कुछ अस्पतालों में डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली दवाएं अस्पताल परिसर के मेडिकल स्टोर पर ही उपलब्ध होती हैं। इससे मरीज के सामने सस्ती दवा खरीदने का विकल्प सीमित हो जाता है। पर्ची डॉक्टर की, दुकान अस्पताल की और ब्रांड कंपनी का-मरीज के पास विकल्प कितना बचता है, यही सबसे बड़ा सवाल है।
विदेश यात्रा से फाइव स्टार सेमिनार तक
दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव द्वारा डॉक्टरों के साथ मासिक बिक्री लक्ष्य तय करने के आरोप हैं। टारगेट पूरा होने पर दुबई, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों के टूर, फाइव स्टार होटलों में सेमिनार, पार्टियां और महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामान देने की बात सामने आई है। अगर ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो सवाल सिर्फ डॉक्टर-कंपनी संबंधों का नहीं रहेगा। सवाल यह होगा कि क्या मरीज की पर्ची किसी कंपनी के इंसेंटिव पैकेज का हिस्सा बन रही है?
अस्पताल को 30-40 प्रतिशत मार्जिन का दावा
एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के हवाले से बड़े निजी अस्पतालों में कंपनी और अस्पताल प्रबंधन के बीच सीधे कारोबारी समझौते का दावा किया गया है। आरोप है कि आईवी फ्लूड, एंटीबायोटिक और इंजेक्शन जैसे उत्पादों में अस्पताल को 30 से 40 प्रतिशत तक मार्जिन मिलता है। छोटे क्लीनिकों के लिए 20 से 50 हजार रुपए प्रतिमाह तक के फिक्स ऑफर दिए जाने का भी दावा किया गया है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। संबंधित दवा कंपनियों, अस्पताल संचालकों और डॉक्टरों का पक्ष भी इस मामले में महत्वपूर्ण होगा।
बीमारी का इलाज या ब्रांड की बिक्री?
इस कथित नेटवर्क का सबसे गंभीर पहलू यह है कि मरीज डॉक्टर पर भरोसा करके दवा खरीदता है। उसे आम तौर पर यह जानकारी नहीं होती कि उसी साल्ट का कोई सस्ता विकल्प बाजार में मौजूद है या नहीं। ऐसे में डॉक्टर की पर्ची मरीज के लिए सिर्फ उपचार का दस्तावेज नहीं रह जाती, बल्कि आरोपों के मुताबिक वह दवा कंपनी की बिक्री बढ़ाने का माध्यम भी बन सकती है।
महंगी दवा के साथ अनावश्यक एंटीबायोटिक का खतरा
विशेषज्ञों ने अनावश्यक ब्रांडेड दवाओं और एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर चिंता जताई है। एंटीबायोटिक का अनुचित इस्तेमाल दवा प्रतिरोध की समस्या को बढ़ा सकता है। यानी कथित कमाई का असर सिर्फ मरीज की जेब तक सीमित नहीं, बल्कि उसके उपचार और स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
अब जांच पर्ची से स्टोर तक हो
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों की मांग है कि दवा कंपनियों से डॉक्टरों को मिलने वाले उपहार और प्रोत्साहनों की जांच हो। अस्पताल परिसर में संचालित मेडिकल स्टोर, डॉक्टरों की पर्चियों पर लिखे ब्रांड, दवाओं की खरीद कीमत और मरीज से वसूली गई कीमत का मिलान कराया जाए। जांच का दायरा सिर्फ डॉक्टर तक सीमित न रहे। दवा कंपनी से एमआर, एमआर से डॉक्टर, डॉक्टर से अस्पताल और अस्पताल से मेडिकल स्टोर तक पूरा पैसा और प्रोत्साहन नेटवर्क खंगाला जाए। क्योंकि असली सवाल यही है-मरीज इलाज कराने अस्पताल पहुंचता है या दवा कंपनी के बिक्री टारगेट को पूरा करने?