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उदयपुर.राजस्थान के शहरी निकाय चुनावों का एक दिलचस्प संदेश है—प्रदेश में जिसकी सरकार, स्थानीय चुनावों में फिलहाल उसी का पलड़ा भारी।
2019–21 के पिछले निकाय चुनावों के समय राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। तब स्थानीय निकायों में कांग्रेस का दबदबा बना और आखिरकार करीब 123 निकायों में कांग्रेस के अध्यक्ष/मेयर, जबकि BJP के करीब 64 बने।
अब 2026 है। सत्ता बदल चुकी है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा हैं और प्रदेश में BJP की सरकार है। नतीजा भी पलट गया—इस बार BJP करीब 4,178 वार्ड जीतकर पहले नंबर पर है और कांग्रेस करीब 3,612 के साथ दूसरे स्थान पर। 309 शहरी निकायों में BJP करीब 148 में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि कांग्रेस करीब 104 में आगे है।
यानी राजस्थान का मतदाता क्या हर कुछ वर्षों में अचानक वैचारिक रूप से बदल जाता है?
या फिर स्थानीय निकाय चुनावों में राज्य की सत्ता, संगठन, उम्मीदवारों का स्थानीय प्रभाव, संसाधन और सत्ता के साथ रहने की व्यावहारिक राजनीति विधानसभा या लोकसभा चुनावों की तुलना में कहीं ज्यादा असर डालती है?
लेकिन इस चुनाव की शायद सबसे महत्वपूर्ण कहानी BJP या कांग्रेस नहीं, बल्कि निर्दलीय हैं।
करीब 2,273 वार्ड निर्दलीयों के खाते में गए हैं—यानी जीते हुए वार्डों का लगभग 22 प्रतिशत। जोधपुर में BJP और कांग्रेस 44-44 पर अटक गए और 10 निर्दलीय निर्णायक हो गए। अजमेर और पाली जैसे शहरों में भी बोर्ड बनाने की गणित में निर्दलीयों की भूमिका महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह क्षेत्र भरतपुर में तो निर्दलीयों ने दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को पीछे छोड़ दिया।
इसलिए BJP की जीत को नकारना भी गलत होगा और इसे कोई विराट वैचारिक लहर घोषित कर देना भी जल्दबाजी।
2019–21 में सत्ता कांग्रेस के पास थी—कांग्रेस स्थानीय निकायों में अव्वल थी।
2026 में सत्ता BJP के पास है—BJP अव्वल है।
लेकिन दोनों चुनावों में एक चीज कायम है—स्थानीय राजनीति दिल्ली या जयपुर के आदेश से पूरी तरह नहीं चलती।
मोहल्ले में सड़क किसने बनवाई, नाली किसने साफ कराई, उम्मीदवार लोगों के बीच रहता है या नहीं, उसकी जातीय-सामाजिक पकड़ क्या है और स्थानीय नाराजगी किसके खिलाफ है—नगर निकाय चुनाव में ये सवाल बड़े-बड़े राष्ट्रीय नारों को भी पीछे छोड़ देते हैं।
और इस बार 2,200 से ज्यादा निर्दलीयों ने दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को एक संदेश दिया है—
राजस्थान में सत्ता किसी की हो, शहरों और कस्बों की राजनीति पर उसका पूरा एकाधिकार अभी भी नहीं है।
अब असली खेल मेयर, सभापति और चेयरमैन बनाने में होगा।
कई जगह जनता फैसला दे चुकी है—लेकिन सत्ता की चाबी निर्दलीयों की जेब में रख दी है।