📰 पूरी खबर:
डॉ नरेंद्र डबकरा(प्राध्यापक भौतिकी)
शोषण विहीन समाज की स्थापना के लिए सभी को शिक्षित होना आवश्यक है। शिक्षा के अभाव में एक स्वस्थ समाज का निर्माण असंभव है। इसीलिए महात्मा गांधी शिक्षा को जीवन से जोड़ना चाहते थे। उनके शिक्षा - दर्शन में शिक्षा केवल अक्षर - ज्ञान या परीक्षा में सफलता प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। उनके लिए शिक्षा का अर्थ था - बालक के शरीर, मस्तिष्क, हृदय और आत्मा में निहित श्रेष्ठ गुणों का सर्वांगीण विकास।
*शिक्षा : एक सुंदर वृक्ष*
गांधी जी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की तुलना "द ब्यूटीफुल ट्री" अर्थात एक सुंदर वृक्ष से की थी। उन्होंने पाया कि भारत में शिक्षा सरकारों के बजाय समाज के अधीन थी। उनके चिंतन में शिक्षा की जड़े समाज, संस्कृति, स्थानीय जीवन और मानवीय मूल्यों में गहरी थी। एक वृक्ष की शक्ति उसकी जड़ों में होती है। जडें स्वस्थ हो तो तना मजबूत होता है, शाखाएं फैलती है और फूल - फल आते हैं। इसी प्रकार शिक्षा की जडें यदि संस्कार, मातृभाषा, संस्कृति, श्रम, नैतिकता और जीवन अनुभव में हों, तो विद्यार्थी का व्यक्तित्व सुदृढ़ बनता है। अतः गांधी जी की दृष्टि में शिक्षा बाहर से थोपी जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि बालक के जीवन और परिवेश से विकसित होने वाली प्रक्रिया है।
*वर्धा शिक्षा सम्मेलन : बुनियादी शिक्षा की आधारशिला*
सन 1937 में गांधी जी की अध्यक्षता में वर्धा शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया गया। गांधी जी ने सम्मेलन में बुनियादी शिक्षा की नई योजना प्रस्तुत की, जो की मैट्रिक स्तर तक अंग्रेजी रहित तथा उद्योगों पर आधारित थी। सम्मेलन में पारित प्रस्ताव के आधार पर 1938 में वर्धा शिक्षा योजना के नाम से बुनियादी शिक्षा अथवा "नई तालीम" का प्रस्ताव पारित किया गया। बुनियादी शिक्षा में समस्त विषयों की शिक्षा किसी कार्य या हस्तशिल्प के माध्यम से देने का प्रस्ताव किया गया। इसमें सीखने पर बल दिया गया। सम्मेलन में गांधी जी की शिक्षा संबंधी अवधारणाओं के आधार पर शिक्षा के आधारभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया। जैसे :-
1. 7 वर्ष से 14 वर्ष की आयु तक बच्चों को निःशुल्क शिक्षा और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराना ।
2.शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो।
3.शिक्षा का उद्देश्य बच्चों के मानवीय गुणों का विकास करना हो।
4.शिक्षा ऐसी हो जिसमें बच्चों के शरीर, हृदय, मन और आत्मा का सामंजस्य पूर्ण विकास हो।
5.सभी विषयों की शिक्षा स्थानीय उत्पाद उद्योगों के माध्यम से ही दी जाए।
सम्मेलन में इन सिद्धांतों के आधार पर विस्तृत पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए डॉ. जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। समिति की रिपोर्ट आगे चलकर बुनियादी शिक्षा के रूप में प्रसिद्ध हुई ।
*4H का सिद्धांत : गांधीवादी शिक्षा का समग्र स्वरूप*
1.Head -
अर्थात बौद्धिक विकास। गांधी जी ऐसी शिक्षा के पक्षधर नहीं थे, जिसमें विद्यार्थी केवल सूचनाऐं रटता रहे। विद्यार्थी में जिज्ञासा, तार्किक चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, रचनात्मकता और स्वतंत्र विचारों का विकास होना चाहिए। इसलिए हेड का अर्थ केवल किताबों का ज्ञान नहीं बल्कि ज्ञान का विवेकपूर्ण उपयोग है।
2.Hand
अर्थात श्रम एवं कौशल।
गांधी जी के शिक्षा दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है - शिक्षा और श्रम का संबंध। गांधीजी चाहते थे कि स्वावलंबन की शिक्षा को केवल हाथ का काम बताकर नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उसके पीछे के 'क्यों' और 'कैसे' को वैज्ञानिक ढंग से समझाना चाहिए। अर्थात करके सीखना, समझ कर सीखना और जीवन में उतारना। इससे विद्यार्थी में श्रम की गरिमा, आत्मनिर्भरता, कौशल, अनुशासन और आत्मविश्वास विकसित होते हैं।
3.Heart
अर्थात संस्कार एवं चरित्र ।
गांधी जी के लिए शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य चरित्र निर्माण था। ज्ञानवान व्यक्ति यदि संवेदनशील नहीं है तो उसका ज्ञान समाज के लिए कल्याणकारी नहीं हो सकता। गांधी जी ने शिक्षा में हृदय की शिक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना। उन्होंने मन और शरीर के साथ आध्यात्मिक एवं नैतिक विकास को शिक्षा का अभिन्न अंग माना। इसलिए विद्यार्थी से केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है - "तुम कितना जानते हो?" बल्कि यह भी पूछना चाहिए - "तुम अपने ज्ञान का उपयोग किसके हित में करोगे?" यहीं से ज्ञान संस्कार में परिवर्तित होता है।
4. Health
अर्थात स्वस्थ शरीर ।
गांधी जी के अनुसार शिक्षा ऐसी हो जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, व्यायाम, खेल, संतुलित जीवनचर्या और मानसिक प्रसन्नता को पर्याप्त स्थान मिले।
गांधी जी के शिक्षा - संबंधी विचारों में शरीर और मन को अलग-अलग करके देखने के बजाय उनके सामंजस्यपूर्ण विकास पर बल मिलता है । उन्होंने शारीरिक प्रशिक्षण, हस्तकला और संगीत जैसी गतिविधियों को भी शिक्षा के व्यापक कार्यक्रम में जोड़ने की बात की थी। इस दृष्टि से विद्यालय में योग+व्यायाम+ खेल+स्वच्छता+ श्रम+प्रकृति से जुड़ाव शिक्षा का स्वाभाविक हिस्सा होना चाहिए।
*आज के संदर्भ में 4H शिक्षा*
वर्तमान में विद्यार्थियों के पास सूचनाऐं तो बहुत है, लेकिन सूचना को ज्ञान, ज्ञान को विवेक और विवेक को चरित्र में बदलना आवश्यक है। गांधीजी की 4H अवधारणा को आधुनिक शिक्षा के अर्थ में इस प्रकार समझा जा सकता है :-
1.Head -
ज्ञान, तर्क, विज्ञान एवं चिंतन।
2.Hand - कौशल, श्रम, प्रयोग एवं कार्य अनुभव ।
3.Heart-
मूल्य, संवेदना, चरित्र एवं सेवा।
4.Health-
शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ तथा संतुलित जीवन ।
यदि इन चारों का संतुलन बन जाए तो विद्यार्थी केवल पढ़ा - लिखा व्यक्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व वाला मनुष्य बनेगा।
*निष्कर्ष*
गांधी जी की बुनियादी शिक्षा में समस्त विषयों की शिक्षा किसी कार्य या हस्तशिल्प के माध्यम से देने का प्रस्ताव किया गया। जिसमें सीखने पर बल दिया गया। गांधी जी की बुनियादी शिक्षा का मूल संदेश था - "शिक्षा जीवन से कटकर नहीं, जीवन से जुड़कर होना चाहिए।" वह केवल मस्तिष्क को सूचना देने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करने वाली साधना है। गांधी जी प्रयोजन वादी थे, क्योंकि वे रुचि के अनुसार क्रिया करके सीखने पर बल देते थे। उनको प्रगतिवादी भी कह सकते हैं, क्योंकि वह बच्चों को उनकी प्रकृति के अनुसार विकसित करना चाहते थे। वर्तमान में युवाओं के पास कई तरह की डिग्रियां है, परंतु रोजगार नहीं है। गांधी जी ने बहुत पहले ही इस समस्या के हल के लिए बुनियादी शिक्षा के अंतर्गत कुटीर उद्योगों पर आधारित शिक्षा पर बल दिया था, ताकि बच्चे किसी न किसी हस्तशिल्प को सीख कर आत्मनिर्भर बन सके। गांधी जी बच्चों में मानवीय गुणों का विकास करने पर बल देते थे । आज मनुष्य में मानवता की कमी के कारण जो विनाश और तबाही फैल रही है, उसमें गांधी जी का शिक्षा - दर्शन आज भी प्रासंगिक है। आज के संदर्भ में गांधी जी के शिक्षा दर्शन को हम एक सुंदर सूत्र में रख सकते हैं - हेड हमें सोचने की शक्ति देता है, हैंड हमें करने की शक्ति देता है,
हार्ट हमें सही दिशा देता है और हेल्थ हमें स्वस्थ रूप से आगे बढ़ाने की शक्ति देता है।
अर्थात सिर में ज्ञान, हाथ में कौशल, हृदय में संस्कार और शरीर में स्वास्थ्य यही सम्पूर्ण शिक्षा है।