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भोपाल । छोटे अपराधों में दोष साबित होने के बाद अब सजा का मतलब हर बार जेल जाना नहीं होगा। मध्य प्रदेश में सामुदायिक सेवा के दंड को लागू करने के साथ अदालतों के पास दोषी व्यक्ति से उसकी गलती का सामाजिक दायित्व के जरिए प्रायश्चित कराने का विकल्प भी खुल गया है। यानी पहली बार किए गए कुछ अपराधों में दोषी को जेल भेजने के बजाय अस्पताल की सफाई, सार्वजनिक स्थानों के रखरखाव, पौधारोपण या जरूरतमंदों की सेवा जैसे काम करने पड़ सकते हैं।
गृह विभाग की अधिसूचना के बाद प्रदेश में सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में प्रभावी किया गया है। इसका आधार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में किया गया प्रावधान है। सामुदायिक सेवा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि दोषी व्यक्ति को उसके अपराध के सामाजिक प्रभाव और जिम्मेदारी का एहसास कराना है।
सजा अब अपराध के साथ व्यक्ति की क्षमता से भी जुड़ेगी
इस व्यवस्था की खास बात यह है कि सामुदायिक सेवा का काम सभी दोषियों के लिए एक जैसा नहीं होगा। अदालत अपराध की प्रकृति और गंभीरता के साथ व्यक्ति की उम्र, शारीरिक क्षमता, शैक्षणिक योग्यता, कौशल, स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ध्यान में रख सकती है। मसलन, कोई डॉक्टर, इंजीनियर, अकाउंटेंट या वकील सामुदायिक सेवा की सजा पाता है तो उसके पेशेवर कौशल का इस्तेमाल जरूरतमंद लोगों के हित में कराया जा सकता है। यानी सजा केवल शारीरिक श्रम तक सीमित नहीं होगी, बल्कि व्यक्ति की विशेषज्ञता को भी सामाजिक उपयोग में लाने का रास्ता खुला रहेगा।
60 दिन तक या 240 घंटे तक सेवा
सामुदायिक सेवा की अवधि एक से 60 दिन अथवा 40 से 240 घंटे तक हो सकती है। इसके लिए जिला परिवीक्षा अधिकारी या सरकार द्वारा नामित अधिकारी निगरानी करेंगे। सेवा का काम अपराध के अनुपात में, सुरक्षित और सम्मानजनक होना जरूरी होगा। दोषी से किसी अधिकारी का निजी काम नहीं कराया जा सकेगा।
अपराध के प्रकार के हिसाब से तय होगा काम
सामुदायिक सेवा के लिए अलग-अलग सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों का इस्तेमाल किया जा सकता है। अस्पतालों में सफाई और रखरखाव, नगर निकायों में सार्वजनिक स्थलों की देखभाल और सफाई, वन विभाग के साथ पौधारोपण व पौधों की देखभाल जैसे काम कराए जा सकते हैं। वहीं वृद्धाश्रम, छात्रावास, मानसिक स्वास्थ्य संस्थान, अनाथालय और पशु आश्रय गृहों में भी सेवा का काम दिया जा सकता है। पुलिस थाना परिसर में सफाई अथवा यातायात और भीड़ नियंत्रण में सहयोग, जबकि चिडिय़ाघर और संग्रहालयों में सफाई, रखरखाव या लिपिकीय सहायता जैसे काम भी निर्धारित किए जा सकते हैं।
किन मामलों में लागू हो सकता है प्रावधान
मानहानि, नशे की हालत में सार्वजनिक स्थान पर दुव्र्यवहार, पहली बार पांच हजार रुपये से कम मूल्य की चोरी, आत्महत्या का प्रयास और लोक सेवक द्वारा विधि के निर्देश की अवज्ञा जैसे कुछ अपराधों में कानून सामुदायिक सेवा का विकल्प देता है। हालांकि इसका इस्तेमाल संबंधित अपराध की कानूनी पात्रता और अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा।
आदेश नहीं माना तो बढ़ सकती है मुश्किल
सामुदायिक सेवा को हल्की या वैकल्पिक सजा मानकर आदेश की अनदेखी करना दोषी के लिए भारी पड़ सकता है। अनुपालन नहीं करने पर पहले चेतावनी दी जा सकती है या सेवा की अवधि बढ़ाई जा सकती है। जरूरत पडऩे पर काम या सेवा का स्थान भी बदला जा सकता है। लगातार या गंभीर रूप से आदेश का पालन नहीं करने की स्थिति में अदालत सामुदायिक सेवा के बचे हुए हिस्से को निर्धारित कारावास की सजा में बदल सकती है। इस तरह नई व्यवस्था छोटे अपराधों में सजा बनाम सुधार के पारंपरिक ढांचे को बदलते हुए दोषी व्यक्ति को समाज से अलग करने के बजाय समाज के लिए काम करने का अवसर देती है।