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नीमच.कृषि विज्ञान केंद्र नीमच मानसून की सामान्य स्थिति की दशा में जिले में सोयाबीन का अपेक्षित रकबा 1 लाख 20 हजार हेक्टेयर, मक्का 30 हजार हेक्टेयर तथा मूगफली 22 हजार हेक्टेयर होने की संभावना है। परन्तु अचानक कमजोर एवं अनिश्चित मानसून की आशंका को देखते हुए खरीफ 2026 के लिए व्यापक तैयारी की विशेष जरुरत है। किसानों को बीज, उर्वरक और चारे की अग्रिम व्यवस्था करने की आवश्यकता है। किसानों को चाहिए 
अल नीनो और कमजोर तथा अनिश्चित मानसून की संभावित स्थिति को देखते हुए किसानों को खरीफ सीजन के लिए अपनी तैयारियों को तेज करे। मानसून सामान्य से काफी लेट चल रहा है और अब तक लगभग 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है. मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक 2 जुलाई तक के सप्ताह में भी बारिश कमजोर रहने की संभावना है। इसका सीधा मतलब है कि खरीफ की फसलों पर प्रभाव पड़ सकता है। खासकर उन क्षेत्रों में, जहाँ खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है.
जिला कृषि आकस्मिकता योजना के आधार पर जिले की जलवायु, फसल पैटर्न, जल संसाधन और जोखिम को ध्यान में रखकर फसलों का चयन करें साथ ही जहां कम वर्षा की स्थिति बनती है वहां वैकल्पिक फसले जैसे उड़द, मूंग जैसी फसले लगाए यानि फसल बदलाव की रणनीति तैयार रखें।
फसल रणनीति - कम अवधि, कम पानी और विविधीकरण
इस दिशा में कम अवधि में पकने वाली और कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसल और किस्मों को बढ़ावा दिया जाए. किसान फसल विविधीकरण अपनाएं, ताकि केवल एक फसल पर निर्भरता कम हो और जोखिम कई फसलों में बँट जाए. इंटर‑क्रॉपिंग और मिश्रित खेती को प्रोत्साहन दें ताकि अगर एक फसल प्रभावित हो, तो दूसरी से आय बनी रहे.  दलहन, मोटा अनाज (श्री अन्न) और तिलहन जैसी फसलों पर विशेष जोर दे। जो सीमित नमी में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
बीज, उर्वरक और इनपुट की अग्रिम व्यवस्था करें।
वैज्ञानिक सलाह है कि 4 से 6 इंच जमीन में पर्याप्त नमी होने के बाद ही बोनी करें. थोड़ी‑सी बारिश में जल्दबाजी में बोनी करने से बीज खराब होने और पुनर्बुवाई का खतरा बढ़ जाता है कमजोर मानसून से पशुधन के लिए चारे का संकट पैदा होना संभव है. इसे देखते हुए चारे की पर्याप्त उपलब्धता जरुरी है, उसके लिए चारा स्टॉकिंग, वैकल्पिक चारा स्रोत और सप्लाई चेन प्लान की आवश्यकता है, ताकि पशुपालकों को अचानक दिक्कत न हो।
उपरोक्त समस्त परिस्थितियों को देखते हुए वैज्ञानिकों द्वारा फसल विविधिकरण पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है।  सोयाबीन के स्थान पर अपने जिले में खाद्यान्न फसलों में मक्का फसल तथा तिलहन फसलों में खरीफ मूंगफली एवं दलहन फसलों में उड़द, मूंग तथा औषधीय फसलों में अश्वगंधा, तुलसी, कालमेघ तथा नवाचारी फसलों में न्यूट्री फसल चिया की खेती कर सकते है। साथ ही विगत वर्षाें में वैज्ञानिक अनुसंधानों एवं किसानों के अनुभव को देखते हुए लाभ की दृष्टि से ये फसले सोयाबीन की अपेक्षा जिले में अच्छा परिणाम दे रही है। किसान भाई यथासम्भव इन फसलों पर शिफ्ट हो सकते है। फसल विविधिकरण से किसान अपने रिस्क को कवर कर सकते है साथ ही संसाधनों का समुचित उपयोग कर सकते है एवं मोनो क्राॅपिंग से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
यदि कोई किसान भाई  सोयाबीन फसल ही लगाने के लिए बाध्य हो तो वैज्ञानिक अनुशंसा के साथ उन्नत किस्मों राजसोया - 18, राजसोया - 24, एनआरसी- 86, जे. एस. 2034, आर.वी.एस. 2011-35  एवं उन्नत पद्धतियों का जैसे रिज फरो, रेज्ड बेड और ब्राॅड बेड पद्धतियों से बुवाई करें। किसान भाई पुरानी /ओल्ड वेराइटी जैसे जे. एस. 95-60 कदापि नहीं लगाए।