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संकलन-लक्ष्मी प्रेमाणी ( जिलाअध्यक्ष)सिंधु सेना महिला संगठन नीमच
नीमच (निप्र)।भारत के सिंधी समुदाय के लिए १० अप्रैल १९६७ का दिन स्वर्णिम इतिहास में अंकित है, जब भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने वाले विधेयक पर हस्ताक्षर किए। तभी से यह दिन सिंधी भाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
१९४७ के विभाजन में जहाँ अन्य समुदायों को उनका भूभाग मिला, पंजाबियों को आधा पंजाब मिला, बंगालियों को आधा बंगाल मिला, लेकिन सिंधियों को आधा सिंध तो क्या उसका एक टुकड़ा तक नहीं मिला और पूरा ‘सिंध प्रदेश’ सरहद के उस पार चला गया। अपनी मातृभूमि से बेदखल सिंधियों को आज़ाद भारत में कोई ऐसी जगह नहीं मिल सकी जिसे वे सिंधी राज्य कह सकें।वहीं सिंधी समाज अपनी मातृभूमि सिंध से विस्थापित हो गया। लेकिन विस्थापन के बाद अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को उन्होंने अपने हृदय में संजोए रखा—यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। जिसकी वजह से सिंधु समुदाय अपनी सिंधी भाषा को अपनी संस्कृति को धरोहर के रूप में संजय रखा है। १९५० में जब भारतीय संविधान लागू हुआ, तब सिंधी भाषा को स्थान नहीं मिला। लेकिन लंबे संघर्ष और अथक प्रयासों के बाद १९६७ में २१वें संविधान संशोधन द्वारा सिंधी भाषा को आठवीं अनुसूची में १५वीं भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे कई महान व्यक्तित्वों का योगदान रहा, जिनमें प्रमुख हैं— जयरामदास दौलतराम –जिन्होंने सिंधी भाषा को मान्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लाल कृष्ण आडवाणी – जिन्होंने सिंधी समाज की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया राम जेठमलानी – प्रख्यात विधिवेत्ता एवं समाजसेवी साधु वासवानी – जिन्होंने शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से सिंधी पहचान को जीवित रखा दादा जे. पी. वासवानी –जिन्होंने प्रेम, सेवा और सिंधी संस्कृति का संदेश फैलायासिंधी साहित्य और संस्कृति को समृद्ध करने में अनेक संतों, साहित्यकारों और समाजसेवियों का भी योगदान रहा है, जिन्होंने भाषा को जीवंत बनाए रखा।भाषा केवल शब्द नहीं, संस्कृति की आत्मा होती है।