लक्ष्मी प्रेमाणी 
( जिलाअध्यक्ष)
सिंधु सेना महिला संगठन नीमच

सिंधु संस्कृति लगभग 2500 ईसा पूर्व विकसित हुई थी। यह सभ्यता सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे फली-फूली। इसके प्रमुख नगरों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, लोथल और कालीबंगा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। यह उस समय की विश्व की सबसे उन्नत नगरीय सभ्यताओं में से एक मानी जाती है।
इस सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सुनियोजित नगर व्यवस्था थी। नगर चौड़ी सड़कों, पक्की ईंटों के मकानों और भूमिगत नालियों से सुसज्जित थे। मोहनजोदड़ो का महान स्नानागार आज भी उनकी स्वच्छता और सामाजिक जीवन का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि उस समय के लोग स्वच्छता और सार्वजनिक जीवन के महत्व को भली-भांति समझते थे।
सिंधु सभ्यता का आर्थिक जीवन मुख्यतः कृषि और व्यापार पर आधारित था। वे गेहूँ, जौ और कपास की खेती करते थे। कपास की खेती का विश्व का पहला प्रमाण यहीं से मिलता है। इसके साथ ही वे मेसोपोटामिया जैसे दूरस्थ देशों से व्यापार करते थे, जिससे उनकी उन्नत व्यापारिक समझ का परिचय मिलता है।
धार्मिक दृष्टि से सिंधु सभ्यता के लोग प्रकृति पूजक थे। मातृदेवी की मूर्तियाँ उर्वरता और सृजन शक्ति की प्रतीक थीं। पशुपति शिव जैसी आकृति हमें योग और आत्मसंयम की परंपरा की ओर संकेत करती है। वृक्षों और पशुओं की पूजा भी प्रचलित थी।
कला और शिल्प के क्षेत्र में भी यह सभ्यता अत्यंत समृद्ध थी। कांस्य की नृत्यांगना, सुंदर मुहरें, मनके और मिट्टी के बर्तन उनकी कलात्मक प्रतिभा के प्रमाण हैं। उनकी माप-तौल प्रणाली इतनी सटीक थी कि आज के वैज्ञानिक भी उसकी प्रशंसा करते हैं।
साथियो, सिंधु संस्कृति हमें अनुशासन, स्वच्छता, समरसता और संगठन का संदेश देती है। तभी तो वेदों में कहा गया है —
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्”
अर्थात हम सब मिलकर चलें और एक विचार से आगे बढ़ें।
अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि सिंधु संस्कृति केवल अतीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणा है। यदि हम उनकी तरह योजनाबद्ध जीवन, स्वच्छता और सामाजिक सहयोग अपनाएँ, तो हमारा समाज भी उन्नति के शिखर पर पहुँच सकता है।