रतनगढ़ (प्रदीप तिवारी )।  रतनगढ़ जब एक किसान अपने खेत में पसीना बहाता है, तो वह केवल बीज नहीं बोता, बल्कि अपने परिवार के सुनहरे भविष्य के सपने बोता है। लेकिन नीमच जिले के रतनगढ़ क्षेत्र के माधुपुरा हल्का नम्बर 33 खेत मोड़ी राम पिता वरदाजी धोबी का जिसको आसाराम हिस्सेदारी पर बुवाई करता था पर किसान आसाराम के लिए का सूरज काल बनकर उगा दोपहर की तपती धूप में जब फसल कटाई की तैयारी चल रही थी, तभी एक भयावह आग ने खुशियों को मातम में बदल दिया। देखते ही देखते करीब तीन बीघा क्षेत्र में लहलहाती गेहूं की फसल खाक हो गई। इस घटना ने एक बार फिर बिजली विभाग की उस कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं, जिसकी अनदेखी की कीमत आज अन्नदाता को अपनी पूरी जमापूंजी देकर चुकानी पड़ी है।

दोपहर का वो मंजर: जब लपटों ने निगल लिया खेत शुक्रवार की दोपहर के समय था। रतनगढ़ से करीब 1 से 2 किलो मीटर गांव माधुपुरा के बीच आसाराम राठौर के खेत में सब कुछ सामान्य था। अचानक हवा के एक झोंके के साथ बिजली के तारों में जोरदार शॉर्ट सर्किट हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, तारों से निकली चिंगारी सीधे सूखे गेहूं के पौधों पर गिरी।
आस-पास के किसान जब तक अपने खेत (Khet) की ओर दौड़ते और आग बुझाने का प्रयास करते, तब तक तेज पछुआ हवाओं ने आग की लपटों को सौ मीटर ऊँचा उठा दिया। धुएं का काला गुबार मील दूर से देखा जा सकता था। बदहवास किसान अपनी आंखों के सामने अपनी साल भर की मेहनत को राख होते देख चीखते-चिल्लाते रहे, लेकिन कुदरत और सिस्टम की मार के आगे वे बेबस थे। 
बिजली विभाग की अनदेखी:
इस पूरी त्रासदी के केंद्र में बिजली विभाग की घोर लापरवाही निकलकर सामने आ रही है। पीड़ित किसानो ने आक्रोश व्यक्त करते हुए बताया कि उनके खेत के ऊपर से गुजरने वाली हाईटेंशन लाइनें काफी समय से ढीली होकर नीचे लटक रही थीं। किसानों का कहना है कि उन्होंने कई बार शिकायतें दी थीं कि ये झूलते तार किसी भी दिन बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। लेकिन अधिकारियों ने इन शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। आज उसी लापरवाही का परिणाम है कि किसानों का हरा-भरा खेत (Khet) आज श्मशान जैसी राख का ढेर बन चुका है।किसानों का सीधा आरोप है कि यदि विभाग समय रहते तारों को कस देता या जर्जर लाइनों को बदल देता, तो आज यह बर्बादी नहीं होती।
 प्रशासन की दौड़-भाग और दमकल की मशक्कत आग लगने की सूचना मिलते ही इलाके में अफरा-तफरी मच गई। सूचना के करीब आधे घंटे बाद दमकल विभाग की गाड़ि मौके पर पहुंचीं। तब तक आग एक खेत से दूसरे में फैलती जा रही थी। दमकलकर्मियों ने काफी जोखिम उठाकर आग को चारों तरफ से घेरने की कोशिश की।कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद लपटों पर काबू पाया जा सका, लेकिन तब तक लगभग तीन बीघा की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी थी।घटना की गंभीरता को देखते हुए तहसीलदार, पटवारी और अन्य प्रशासनिक अधिकारी व स्थानीय जनप्रतिनिधि नेता पिंकेश मंणडोरा केशव चारण पहुंचे और किसान को सानतना देते हुए बताया की चिंता करने की कोई बात नहीं उन्होंने नुकसान का जायजा लिया और किसानों को उचित मुआवजे का आश्वासन दिया। हालांकि, किसान इस बात से डरे हुए हैं कि मुआवजे की प्रक्रिया इतनी जटिल न हो जाए कि उन्हें राहत मिलने में महीनों लग जाएं।
आर्थिक चोट और अनिश्चित भविष्यएक बीघा गेहूं तैयार करने में किसान की हजारों रुपए की लागत आती है। गेहूं की फसल का मतलब है लाखों रुपए का सीधा नुकसान। कई किसानों ने इस फसल के भरोसे कर्ज ले रखा था, तो किसी को बेटी की शादी करनी थी। अब उनके पास अपने खेत  की मिट्टी के सिवा कुछ नहीं बचा है।
यह घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि सिस्टम की उस सुस्ती का परिणाम है जो अक्सर गरीब की जान और माल पर भारी पड़ती है। नीमच जिले इन किसानों का दर्द आज पूरे प्रदेश के अन्नदाता का दर्द बन गया है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन केवल पंचनामा बनाकर कागजी औपचारिकता पूरी करता है या वास्तव में इन पीड़ित परिवारों को उनके उजड़े हुए खेत (Khet) का हक दिलवा पाता है।